Sunday, February 10, 2013

copra- life or poison

copra- life or poison
-BY Dr. Rohit kumaar 96 batch
published in SPRIHA 2001-02 issue

"बनवारी हो, रहरी में बोलेला सियार": गाता हुआ रामसरन तपती दोपहरी में सूरज को चुनौती देता अपने खेतों की रखवाली कर रहा था. तभी उसकी नज़र बरगद के जड़ पे बैठे जोखू पर पड़ी. जोखू सर झुकाए, बेबस लाचार ऐसा लग रहा था मनो उसे गोहत्या का पाप लग गया हो. रामसरन पुच बैठा-"का ह जोखू भाई...का हाल बा...?" जवाब में जोखू ने केवल सर उठाया. उसके अश्रुपूरित आँखों और चेहरे के काले पद गए झुर्रियों से इतना तो स्पष्ट था कि वह किसी भारी विपत्ति का शिकार हो गया है. भर्राए गले से उसने बताये की उसका बेटा जामुन के पेड़ से गिर गया है और अब तक बेहोश है. डॉक्टर इलाज़ करने से पहले CT scan कराना चाहते हैं. अब उसके पास इतने पैसे तो हैं नहीं की वह ये जांच करा पाए. सरकारी अस्पताल में तो यह जांच होता भी नहीं. राम्रासन पूछ बैठा-"लेकिंज ५ साल पाहिले जब रघुआ के बेटा बेहोश भेल रहे तब त बिन जांच के ही इलाज़ हो गेल रहे?". जोखू का जवाब था-"डॉक्टर साहब कहलन कि उनका COPRA के डर बा".
              "ई COPRA का ह भाई"
पुरे गाँव में स बात पे बहस छिड़ गयी. आखिर यह क्या चीज़ है? इससे इतने बड़े बड़े भगवान् के दुसरा रूप कहे जानेवाले डॉक्टर लोग भी डरने लगे?किसी के अनुसार यह उसका बहाना होगा, या फिर कोई जांच में मिलने वाले कमीशन की बात करता.

शहर में पढने वाले भोलू ने बताया कि उसने COBRA का नाम सुना है जिसका काटा हुआ पानी भी नहीं पी पाता  है. तो हो सकता है यह COPRA  भी उसी का कोई भाई बंधू होगा. अंत में लोगो ने निष्कर्ष निकाला- यह ऐसा कानून है की फिर डॉटर भगवान् नहीं रह जाता, उसे भी व्यापार के दायरे में दाल दिया जाता है.

जोखू के मन में अंतर्द्वंद चल रहा था. इस क़ानून से किसको लाभ है? डॉक्टर और मरीज़ दोनों परेशान हैं. अगर कानून डॉक्टर से ऊपर है तो फिर इलाज़ कचहरी में होना चाहिए? कम से कम कानून इलाज़ नहीं करता पर जांच ही फ्री में करा देता. भाई, कोबरा के काटे का इलाज़ है पर इस क़ानून का कुछ नहीं. यह तो बिना देखे ही काटता है.
जोखू देख रहा था बेहोश बेटा मरणासन्न हो रहा था, copra का विष चढ़ता जा रहा था. उसकी कोई भी सांस अंतिम हो सकती थी.

मानवता की बेड़ियों में जकड़ा सिसकता एलोपेथिक डॉक्टर समाज

मानवता की बेड़ियों में जकड़ा सिसकता एलोपेथिक डॉक्टर समाज 
-by Dr. Mrityunjay sarawagi. M.S. dept of surgery
      published in SPRIHA 1999 issue.

सफ़ेद कोट , गले में आला, इलाज़ की चुनौतियों एवं शल्य क्रिया के रोमांच से अभिभूत प्रत्येक विद्यार्थी अपने अथक परिश्रम से मेडिकल कोल्लेज में दाखिला लेता है. ५-८ वर्षों के तपस्या के बाद वह स्वतंत्र रूप से व्यवसाय से जुटता है.इस व्यवसाय के जोखिमो से और रोज़ की उतरदायित्व से उसे पता चलता है की हर वह चीज़ जो चमकती है सोना नहीं होती.

आज व्यवहार में आने वाली सभी चिकत्सा पद्धतियों में  एलोपेथिक सबसे प्रमाणिक चिकत्सा प्रणाली है.सच ये भी है की इस चिकित्सा पद्धति की अपनी परिधि , लक्ष्मण रेखाएं, एवं जटिलताएं हैं. पाश्चात्य विज्ञान पर आधारित इस चिकित्सा का प्रचलन भारतीय सामाजिक एवं आर्थिक परिप्रेक्ष्य में चिकित्सक के समक्ष कई बार किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति उत्पन्न कर देता है.
निकट के समय में चिकित्सक ये अनुभव करने लगे हैं की मरीज़ के अभिभावकों की अपेक्षाएं , आक्रोश,अविश्वास एवं असंतोष की भावना बढ़ने लगी है.तो क्या चिकत्सकों के मूल्यों का ह्रास हुआ है? क्या इस स्थिति में केवल चिकित्सक उत्तरदायी हैं?यह सच है कि सामाजिक मूल्यों में कमी का असर इस व्यवसाय पर भी पडा है. कुछ चिलित्सक अपने क्रियाकलापों से इसे कलंकित कर रहे हैं. लेकिन इनकी संख्या कम है. इस संख्या मे वृद्धि MBBS degree धारकों से नहीं है, बल्कि अल्पकालिक एवं अपर्याप्त योग्यता वाले वैसे चिकित्सकों से है जिन्हें एलोपेथिक शिक्षा का विधिवत ज्ञान नहीं है. और जो अपने मरीज़ के इलाज़ में गलत तरीको का प्रयोग करते हैं.
आज एक तरफ तो मानवता का ढोल चिकित्सक के गले से बंधकर लोग उन्हें अपमानित एवं प्रताड़ित करने से भी  नहीं चुकते. वहीँ साथ साथ COPRA-consumer protection act की जंजीरों में हमें जकड दिया जाता है. इस स्थिति में हम सिसक तो सकते हैं, प्रतिवाद नहीं कर सकते हैं. यदि इस चिकत्सा विधि में विस्वास रखने एवं लाभान्वित होने का अधिकार तो मरीज़ को है तो इसके दोषों एवं इसकी सीमा रेखाओं को भी उन्हें ही समझना एवं स्वीकार करना होगा. चमत्कार अलाद्दीन का चिराग या संजीवनी बूटी जैसा इलाज़ इस पद्धति की चिकित्सा विधि में नहीं है. हम संवेदनहीन नहीं हैं,लेकिन अप्रत्याशित परिणाम, अभिभावकों की असामयिक, अनुचित एवं अपनी सुविधानुसार मांगों की पूर्ति नहीं होने पर मानवता के कटघरों में खड़ाकर जिस प्रकार हम अपमानित और पप्रताड़ित हो रहे हैं उस मानसिक वेदना एवं क्षोभ का आभास कर पाना शायद दूसरों के लिए संभव नहीं है.
चिकत्सा ऑफिस में पड़ी कोई फाइल नहीं है जिसपर दबाव डालकर कोई मनोकुल आदेश पारित कराया जा सके, यह परस्पर विश्वास एवं सहयोग से ही संभव है. आनेवाला समय एलोपेथिक चिकित्सक के लिए और जटिल हो सकता है, साथ ही मरीज़ विशेष  कर गंभीर रूप से  बीमार मरीजों के इलाज़ में परेशानियां आ सकती है. अगर हम आज जागरूक होकर इस व्यवसाय को बनाम करने वालों का बहिष्कार शुरू न करें एवं लोगों को इस चिकत्सा विधि की वस्तुस्थिति से अवगत न करायें.

Saturday, January 26, 2013

lecture theatr-a description of our classroom scene

"a descriptive study of the classroom situations at rims,ranchi by Dr. Govind madhaw and Dr. Chandan kumar yadav"

आदमियों की एक आदत होती है,जहाँ भी गए, जो भी देखा,या जो कुछ भी मिला उसमे कुछ न कुछ बुराइयां जरुर निकालेंगे अपनी बुद्धि का प्रदर्शन करने के लिए. मैं भी एक इंसान ही हूँ और इसलिए ये सद्गुण मुझमे भी व्याप्त है. यूँ तो बुराई करने को हज़ारो चीज़ें है  इस जहाँ में मगर मैं उस चीज़ पे ज्यादा मेहरबान हूँ जो मुझे सब से ज्यादा अज़ीज़ है और अजीब भी.
जी हाँ, आपने बिलकुल ठीक समझा. ये है हमारा क्लासरूम. यानी lecture theatre. सही मायने में भी यह किसी ड्रामा थियेटर से कम नहीं यानी नौटंकी से भरपूर. आइये नौटंकी का पात्र परिचय सेगमेंट शुरू करें.....
1.students- future doctors, future.....
2. assets of students
3. teachers-professors.doctors
4. assets of teachers
5. attendance
6. lecture
so these were the headlines of the hour.
now in details...
1. STUDENTS-
 इस नौटंकी थियेटर में निम्नलिखित प्रकार के विद्यार्थी पाए जाते हैं...
१. जिनकी नींद हॉस्टल में पूरी नहीं हो पाती
२. इन्हें कम सुनाई देता है यानी पीछे बैठने वाले,....शायद पीछे साफ़ आवाज़ पहुँचती हो
३ . एकाध गो आगे बैठ के मुड़ी हिलाने वाले......क्लास की इज्ज़त के अंगरक्षक
४.. सज धज के क्लास में ज़रा देर से आने वाले ...सही में इन्ही के सहारे तो समय कटता है.
५..इनकी सजावट को निहारने वाले

2. ASSETS OF STUDENTS-
a. Earphone- स्टूडेंट्स की अहम् जरुरत है...बुढापे की लाठी है..नंगे का लंगोटा है..डूबता के लिए तिनके का सहारा है
 जहाँ एक तरफ टीचर्स के मधुर वचनों से बचाता है वहीँ batchmates द्वारा बनाये गए मजाको से भी अनजान रखता है, अपने antisedative action के लिए भी यह काफी मशहूर है. लेकिन इसके कई साइड इफेक्ट्स भी हैं .जैसे attendance छुट जाना या फिर किसी दुसरे के रोल नंबर पे आवाज़ दे देना इत्यादि....
b.टोपी- यह गंजो के लिए लंगोटी है , हाँ भाई वही इज्ज़त ढंकने वाली. कुछ लोग इसका प्रयोग आगे झुक कर नींद मर्लेने के लिए भी करते हैं. या फिर नज़ारे बचाकर किसी को निहारने के लिए भी ये अक्सर प्रयुक्त होता है.हाँ एक बात और, अगर सुबह देर से नींद खुली हो और बिना नहाये क्लास आना पड़े तो भी यह बहुत उपयोगी है...
c.मोबाइल फ़ोन -यह सुदर्शन चक्र है. टारगेट पे अचूक निशाना लगाता है. नर या नारी...सभी छात्रों को यौवन को सही मायने में enjoy कराने में यही एकमात्र मददगार है. रूमानियत महशुश करना हो, नए रिश्तो को पनपाना हो, sms यानि "सरल मोबाइल सन्देश " भेजना हो या टीचर्स को मिस कॉल मर कर तंग भंग करना हो....तो हर मर्ज़ की बस एक दवा है ---मोबाइल. हाँ धार्मिक विडियो देखने और दिखाने में भी यह काफी प्रशिद्ध है.
d. कलम - लेखनी ...नोट्स लिखना इसका सबसे तुच्छतम प्रयोग माना जाता है. सबसे महत्वपूर्ण प्रयोग है कान खुजलाना, सामने वाले की पीठ में उकेत्तना , कार्टून बनाना ...बाकि हर कलाकार की कबिलियत पर......
e.बेंच-डेस्क - महत्वपूर्ण कार्यो  का निष्पादन इसके बिना असंभव प्रतीत होता है. सतयुग से ही इसका प्रयोग ड्रम बजाने में, कार्टून बनाने में, धार्मिक चित्रकारी में, इसके निचे छिपकर मोबाइल काल अटेंड करने में, इत्यादि अनुशंधानो में होता रहा है.

3. TEACHERS-
हमारे यहाँ यानि रिम्स में योग्य शिक्षकों की कोई कमी नहीं है. एक से बढ़कर एक विद्वान्,आचे clinicians,doctors, और अनुभवी प्रोफेसर हैं हमारे पास. कईयों के पास तो विदेशी डिग्री भी है.शायद इसलिए इनमे से कई हिंदी बोलने में अपनी डिग्री की बेईज्ज़ती समझते हैं.कुछ तो यहाँ तक कहते हैं-" u are a medico, u must try to live with english. All of u note it, when i speak then i speak, when u speak then u speak, dont speak in between between." और इसलिए वार्ड में हम मरीजों से पूछ बैठते हैं -"ऐ जी सरसती देवी, जपला से आये हैं, ok then plz let me know about severity of ur angina..." और मरीज़ बेचारे हक्का बक्का. कुछ कान्वेंट स्कूल के प्रोडक्ट्स ने एक बार हिंदी में मरीज़ से पूछताछ करने की ज़हमत उठाई. और एक महिला से पूछने लगे-"हाँ तो आपकी महामारी कैसी है?????"  अब उस ग्रामीण महिला को क्या पता की मेम साहब माहवारी को महामारी बोल रही है ..अब अपनी भाषा की अल्पज्ञता का ये नमूना......खैर...अंग्रेजी makes us feel superior then others....इसलिए तो हमलोग फाइनल मौखिक परीक्षा के पहले english spoken class join कर लेते हैं.
किसी किसी टीचर की आवाज़ इतनी अच्छी  होती है की पहले बेंच पे बैठ कर हमें अपनी कानो पर विस्वास ही नहीं होता. हो सकता है कि maaleus and incus में demand hypertrophy हो जाये.
हालाँकि हमारे प्रोफेसर डॉक्टर के पास समय का सर्वथा अभाव रहता है फिर भी वे अपना कीमती समय हमें देते हैं, वाकई ये गर्व की बात है.उनकी व्यस्तता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि क्लास के बीच में ही उन्हें कितनी ही बार फ़ोन पे बात करना पड़ता है. और उनके वार्तालाप पे हम तरह तरह के निष्कर्ष निकलते रहते हैं, जैसे-"जरुर बीबी का फोन होगा....नहीं रे कोई आइटम भी तो हो सकती है....न रे मरीज़ फंसा रहे होंगे...कम्पनी का भी तो हो सकता है...ना ना medical representative  से होटल बुक करवा रहे होंगे...."...
कुछ प्रोफेसर को तो chalk allergy होती है, कारण  हमारे श्याम पट  यानि black board का अति सुविधासंपन्न होना भी हो सकता है, या फिर हम क्षात्र  इतने कुशाग्र बुद्धि है कि शिक्षक्मुखाग्र से निकले शब्द रूपी प्रसाद को कर्ण पथ से निगलने को आतुर रहते हैं हम, और शायद इसलिए लैपटॉप के ज़माने में भी श्रुति स्मृति ज्ञान विधि को ही बेहतर समझते हैं और इसलिए उन्हें श्याम पट पर कुछ भी लिखने की जरुरत ही नहीं पड़ती.

4. ASSETS OF TEACHERS-
 तो हमारे क्लास रूपी स्टेज में शिक्षकों को अपनी कला प्रदर्शन के लिए जिस अत्यंत महत्वपूर्ण यंत्र की आवश्यकता पड़ती है वो है विद्युत् चालित प्रक्षेपक यानि "PROJECTOR". इसके भी दो प्रकार है, एक मल्टीमीडिया वाला यानि HIV- HIGHLY IMPORTED VARIETY का और दुसरा बाबा आजम के जमाने से चला आ रहा....
बीच लेक्चर में अगर बिजली रानी मायके हाली जाये तब मनो ज़िन्दगी थम जाती है. हाई-फाई डिस्कसन से हम तुरंत साधारण बातों की पढ़ाई करने लग जाते हैं, या फिर ऐसे ही गप्पे हांक कर क्लास किसी तरह ख़त्म कर दी जाती है.

5. ATTENDANE-
यह शब्द आंग्ल भाषा के शब्द ATTENTION से बना हुआ प्रतीत होता है,जिसका शाब्दिक अर्थ होता है ध्यान देना. मगर हमारे यहाँ यह एक MISNOMER है. अर्थात PHYSICAL AND MENTAL PRESENCE की बजाय सिर्फ PHYSICAL PRESENCE को प्राथमिकता दी जाती है. हालाँकि आपके दोस्तों की दुआ से आप इस से भी निजात पा सकते हैं. मगर उसके लिए जिस रासायनिक अभिक्रिया की जरुरत पड़ती है उसका नाम है-  प्रॉक्सी..
PROXY- It is a type of social ativity, done in good faith to ensure the dual presence of his client in the future university exam as well as by that time outside the class.
वैसे तो ATTENDANCE को MCI ने MUST बना दिया है, क्लास आना अच्छी बात है मगर कुछ प्रश्न अभी भी उत्तर की तलाश में sms बनकर भटक रहे हैं.
१. आखिर क्यों यह बताना पड़ता है की attendance जरुरी है ?
२.क्या हर ८०% attendance वाले का एग्जाम अहह ही जाता है?
३.क्या प्रॉक्सी लगवाने वाले हमेशा फेल ही होते हैं?
४.आखिर प्रोक्सी की जरुरत ही क्यों पड़ती है?
५.जहाँ एक तरफ attendance कम होने पर , चाहे कोई भी मजबूरी हो, हमें sent-up होने से रोक दिया जाता है, वहीँ दूसरी तरफ over-attendance होने पर अगले साल उसका कोई भी बोनस या फायदा नहीं मिलता.ये तो सरासर अन्याय है..?

6. LECTURE
हमने सुन रखा था कि स्कूल में क्लास होते हैं और कॉलेज में leture. मगर आज तक हमें ये अंतर नहीं समझ में नहीं आया की class and lecture में अंतर क्या है? यहाँ भी हमें definitions रटवाए जाते हैं तोते की तरह,notes लिखवाए जाते हैं पहले क्लास के बच्चे की तरह.शिक्षक अपने अनुभव और बारीकियां profess करने की बजाय अपने स्लाइड्स की reading करना ज्यादा पसंद करते हैं. कुह लोग तो पूरी की पूरी किताब हनुमान चालीसा की तरह बिना किसी पड़ाव के धाराप्रवाह बहा कर चले जाते है...
एक टीचर को सिर्फ एक टॉपिक मिलता है पढ़ाने के लिए.वो भी सदियों से उसी को पढ़ाते आ रहे हैं. मगर ताज्जुब वे हर साल एक ही नोट्स को लिखवा भर देना अपना फ़र्ज़ समझते हैं, भले उनकी कर हर साल बदल जाए मगर हर साल उस टॉपिक पे वही चुटकुला चलता है,हर बार लड़के वही उबाओं कहानी सुनते हैं..और नोट्स भी वही...जिसे कुछ छात्राएं बड़ी म्हणत से छपने का काम करती हैं, और हम उनसे फोटो कॉपी करवा लेना अपना परम कर्तव्य समझते हैं.इन नोट्स को पढने की कोशिश सिर्फ एग्जाम के पहले की जाती है, क्यों की ऐसा अंधविश्वास है की इन्हें लिखने से एक्साम में पुरे मार्क्स मिलते हैं.
एक टीचर को सप्ताह में एक ही क्लास मिलता है, यानि एक सप्ताह में ६-७ टीचर अलग अलग टॉपिक शुरू कर देते हैं. मसलन नज़ारा ऐसा होता है कि एक तरफ हम neoplasia का  definition रट रहे होते हैं वहीँ दूसरी तरफ साथ साथ हमें melanoma surgery भी पढनी पड़ती है और अगले तरफ prostate का ट्रीटमेंट.
क्लास में कव्वाल्ली की टीम की तरह लड़के-लड़कियों के अलग अलग बैठने पे तो हर साल टीचर्स अपनी कहानिया सुनाते हैं-"हमारे समय में तो ऐसा नहीं था..बहुत फ्रैंक था हमारा बैच ...साथ सिनेमा देखने जाते थे..."

ज्यादा पोस्ट-मार्टम नहीं करना चाहिए, वरना कल को गए जब मेरा p.g. में नहीं होगा तो लोग यहि कहेंगे की "ई लड़का साल भर खली यही सब research किया है तो रिजल्ट कैसे होगा?????" इसलिए पाप ज्यादा नहीं बटोरते हुए अलविदा. कल किसी और टॉपिक का पोस्ट-मार्टम किया जायेगा......जाइए लाश का इंतज़ाम कीजिये....

Saturday, October 20, 2012

this is the beauty of medical science

"This is the beauty of medical science."
Exceptions are rules.

Facts are superior to theory.

Memory is the only best trick to understand it.


Mnemonics are like chemical formulas of millions of molecule.have to mug up all.



Even an illiterate patient may declare u within a fraction of second as - "ye to kharab doctor hai...." and the worst part is people take it as a certified data against you."



Most beautiful nurses u keep to entertain ur patients as cheer girls rather than for urself.

Every next year new edition of book comes and suddenly whole of ur knowledge till gained sum up into a big zero. restart the new one from the very first page whole of the year till new edition comes again to screw u.

Your patient will die if u apply ur concept instead of fixed protocol. bcoz there is a huge screwier named as "idiosyncrasy'.

So on.....describing the beauty of medical science.....keep on adding ur pain.....

Sunday, September 2, 2012

आपबीती - डॉ बबुआ से डॉ बाबा तक का सफ़र

आपबीती - डॉ बबुआ से डॉ बाबा तक का सफ़र 

                   डॉ चन्दन कुमार ,2006 batch,RIMS, RANCHI.

बहुत लफ्फा-सुट्टी, हेन -तेन , घिस -लपट और This -that के साथ campus का life ख़त्म होने को है। कितनी चुभती और गुदगुदाती यादों से भरा रहा सफ़र। कुछ भूल गए, कुछ भूला दिए गए।कुछ भूलकर भी न भूले गए और कुछ जबरन याद दिला दिए गए।

17 अगस्त 2006 [very special day]- campus  का पहला दिन। सादे लबादे में खुद को लपेटकर एक खादी का झोला हाथ में ,और साथ में medico होने का certificate  यानि hostel -i.d. हलके पानी में भींगते हुए MCD के पास सुबह 8 बजे एक दोस्त ने कुछ कहा---. 

दिल में डर था पर दिमाग में मेडिको होने का गुरुर। पैर तो जमीन पर थे ही नहीं।काउंसेलिंग के अगले ही दिन अपने दोस्तों के साथ हॉस्टल facility देखने गया। जब बॉस को पता चला की एक junior है, तो उन्होंने कहा-' कहाँ छोटू?बाराती के साथ तो सब girls -hostel जाते हैं,तुम boys -hostel में क्या कर रहे हो? क्या चिड़ियाघर घुमने आये हो? समय की नजाकत को भांपते हुए बिल्ली की तरह निकलने में ही भलाई समझी।बड़ी adventurous एंट्री थी। एक और बात तो भूल ही गया। महुआ' से तो वाकिफ ही होंगे। बोतल वाला नहीं, पेड़ वाला ....ठीक उसी तरह टेबल पर पड़े cadaver को देखकर मेरी कुछ कमसीन सखाएं टपक गयी थी।कई ghuro-metre सफ़ेद बगुलों की लार टपक पड़ी थी।

2.10 pm , physiology practical  ख़त्म। त्राहिमाम। सब अपने अपने ख़ुफ़िया रास्ते  से भाग निकले।हम अनजान। हुए परेशान। आफत में जान। physio ladies toilet खुला था- बेटा। मौका पहचान। यही होगा जीवनदान। जैसे मेरे पिछवाड़े से आकाशवाणी हुई। seniors से तो बच गए, but staff ने लगा दिया बहार से ताला। हो गया गड़बड़ घोटाला।बुरे फंसे मियां जान। सुबह हो जाएगी इज्ज़त नीलाम। .........खैर ....

3rd button देखते हुए प्रणाम बॉस की हवाई firing करते हुए हॉस्टल की छत पे पहुंचा दिए गए। वाह।क्या नज़ारा था मनो early-man फिल्म की शूटिंग चल रही हो। हम सब homo -sapiens evolution के पुराने दौर में थे।वो कबड्डी आज तक याद है।

नेक्स्ट station- जोड़ा तालाब, friends hostel . यह हमारे batch का training कैंप था। यहाँ हमने सीखा शेविंग करना, कडुआ तेल लगाना, बाल काटना, clean shave का exact मतलब , hostel i.d. करीदना और पेट भर कर k .c . करना। बताता चलूँ की 'कान चाटना' k.c. का civilized translated version है। और हाँ emergency में एक ही बाथरूम  में नहाना .....ही।ही। ही।।।।।

समय बीता. अब हम बड़े कारनामे करने लगे थे. किसी दोस्त के जन्मदिन पर मरीन ड्राइव में चिल्लाना और मिनी-ऑडिटोरियम के पीछे भसान डांस करना फिर मधुवन में खाना और दोस्त की थाली से चौमिन चुराना और एक ही ऑटो में लड़ाकर २५-३० लडको का आना."आज भी उन खानों की महक बाकी है इन साँसों में".

"हूटिंग करने का मजा और बड़े बड़े ग्रंथों में डूबने की सजा." मूड फ्रेश करने के लिए हमने कई सुहानी शामे लालपुर में गुजारी.

उस हादसे के साथ हम भी सीनियर बन गए.
venue-marine drive.
 time-9.00am.
host- 2k6 boys
guest- 2k7 girls + boys
cross-ragging or introduction का अद्भुत दृश्य और शायद आखिरी भी.
क्लाइमेक्स तो तब आया जब ऍन वक़्त पर कॉलेज के महामहिम का काफिला आ धमका. फिर तो हमलोग ऐसे भागे जैसे किसी ने मधुमक्खी के छत्ते पर पत्थर मार दिया हो.

सेकंड इयर. वार्ड ड्यूटी शुरू. पहली बार डॉक्टर टाइप से फील हुआ.और साथ में शुरू हो गया सेकंड इयर सिंड्रोम. दो दिन खांसे तो लगा की टी.बी. हो गया है,चेस्ट पेन हुआ तो हार्ट अटैक की पढ़ाई शुरू.फिर तो रिम्स से अपोलो हॉस्पिटल तक का e.c.g.से echocardiography तक सबकुछ करा लिए. जब मेरे एक सीनियर को पता चला तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा- 
           " बेटा .Angina pectoris is an endemic infectious diseas of medical colleges caused by Angellina jollie."

सेकंड इयर का लाइफ भी e.c.g. के ग्राफ की तरह उबड़ खाबड़ रास्तों से होकर गुजरा. जैसे तैसे एग्जाम देकर MBBS का half life पूरा किया.

बहुत ही खट्टी और थोड़ी मीठी यादों के साथ 3rd year  का life गुजर रहा था.करीबन १२ महीने तक लगातार examinee batch होने का गौरव प्राप्त हुआ. क्लास तो नसीब न था. हॉस्टल में रहकर एग्जाम की तैयारी करनी थी. लग रहा था mbbs का correspondence course  कर रहे हों और PLT में जाकर test series दे रहे हैं.इसी बीच बेरोजगारी के क्षणों में कुछ हादसे भी हुए. anti-social  का अवार्ड मिला,काला-पानी की सजा मिली, socially outcast हुए, बरजत की उपाधि से नवाजे गए, और तब से लेकर आजतक probable suicidal candidates list  में मेरा नाम टॉप पे विराजमान है. क्या शानदार प्रदर्शन है, मगर हैरत की बात ये है की मैं आज तक ज़िंदा हूँ. बात अलाग है की palpitation aur hypertension  लेकर शर्मिंदा हूँ, और हाल से ही गांजा-दारु-ciggerate की गली का बासिन्दा हूँ.

अब कुछ घटनाएं संक्षेप में-
१.दो साल से अज्ञातवास और एकांतवास में गए बाबा का पुनर्जन्म
२. 7th day  जैसे article का controversial writer बनने का श्रेय प्राप्त.
३. '7th day' is an article of its own kind showing the controversial attitude and the volatile personality of the writer and the editor too. and the lack of support from batchmates as per the expectations.---spriha 2020

४. और आया 3rd MB का एग्जाम. 2k6-2k7 साथ साथ. दम भर k.c. किये और करवाए.

और अब आखिरी पड़ाव .

सुना था डॉक्टर कब्र में भी पढ़ते हुए पाए जाते हैं.इसलिए harrison-davidson के साथ दफनाये जाते हैं.एक पाव का दिमाग और १० पसेरी का किताब. मैं जितना था बिंदास --बन बैठा उतना ही बड़ा सेंटी-दास. किसी किसी को तो तुलसीदास भी नज़र आता हूँ.

कॉलेज लाइफ शुरू हुआ था BBC खैनी बिक्रेता {सिनर्जी २००७} से और ख़त्म हो रहा है दारू सिगरेट से. synergy  में वो नौटंकी करना, शिखंडी बन कर चीर हरण करवाना, १०८ चुड़ैल के साथ रात गुजारना,गब्बर सिंह को खैनी खिलाना और माधव की फिल्म में विलेन का रोले निभाना.....

एक अंतर्मुखी लड़के को synergy के स्टेज पर कुछ कहने और करने लायक बनाने के लिए मैं अपने सीनियर का ताउम्र शुक्रगुजार रहूँगा.

एक विशेष अनुभव---
पहली बार सैनिक की तरह लड़ने का मौका मिला था. बस्ती वालो से लड़ाई हुई थी.पूरा कैंपस एकजुट.बीमारियों से लड़ने वाले डॉक्टर खुद को बचाने के लिए लड़ रहे थे. जीवन तो एक युद्ध क्षेत्र है, ये तो महज एक युद्ध का आगाज़ था...

कैंपस की एक परंपरा दिल को छू लेने वाली है.
MB exam  के पहले सीनियर और जूनियर का "all the best " समारोह.

जाते जाते यादों का पिटारा भर रहा हूँ.
कुछ गुदगुदाते लम्हे, कुछ हेन- तेन कुछ this-that..
मैंने इन सब से बस यही सिखा  है-
 "किसी भी रिश्ते को अगर निभाया न जा सके तो उसे उस मुकाम तक पहुंचा कर छोड़ देना चाहिए कि फुर्सत में याद करें तो खुद पर नाज़ कर सके."

और एक दरखास्त खास उनसे-

"अभी उलझा हूँ खुद की जिंदगी सुलझाने में 
फुर्सत मिली तो तेरी जुल्फे सुल्झाऊंगा 
सोचूंगा जरुर उन लम्हों को
कभी मोहब्बत की थी तुमसे
कभी शरारत की थी तुमसे"

Monday, August 23, 2010

Why Doctors Should Not Be Emotionally Attached with patients?

“For patients, doctors are next to the God, conversely, patients being the mysterious God to doctors.” I remember this quote by a famous person I had read in a magazine during my schooling. After so many years, during short course of these two years in medical college, I can feel the heavyness of these words.

Like God, patient’s body is a mystery to be solved. Solving this mystery, the doctor’s emotional state and their way of dealing with their own emotions have been playing a critical role. Such emotions have been continuously expressing difficulties in revealing sensitive information to their patients, affecting medical decisionmaking and ultimately affecting the whole physical outcome.

If doctors attach themselves emotionally, their feelings for the pat ients will suffer from the resulting lack of judgement. If every medical professional gets emotional with patients then we would have blabbering Doctors walking around, not making clear conscious decisions. They have to separate themselves from their patients in order to do their jobs. This is what keeps them sane. Besides if they took on every emotional task with every patient that came into their office or hospital especially if that patient was dying, then the doctor would not be able to function after sometime. He/She would end up taking it home.
Feelings seem to add an important dimension of complexity to doctors. It has been seen that doctors attending patients, when get emotionally attached to them, then that makes them more vulnerable to feelings of loss when these patients die. Studies have shown that junior doctors may be more strongly affected by patient’s death than senior doctors and female doctors report more psychological distress than male doctors indicating that female doctors and interns may require more emotional support after patient’s death. By this, I don’t mean doctors and other medical professionals should be cold and heartless, but they have to maintain a certain distance from their patients in order to keep going on a daily basis.

The medical profession is definitely no walk in the park, even though it is really rewarding and in addition to the miracles, they see a lot of tragedy. Also, when a patient is sick, the doctor should not be over emotional and panicky. They should be able to think straight so that they can give the best care possible and they have to put on a brave face for their patient. They must learn to control their emotions in order to do their job.
Same thing goes for many very, very professional music teachers. Many people who take up music and really feel their music so much that it becomes part of their soul.They go crazy over expressing their emotions in their music. But since they are teachers, they cannot let out their emotions in front of their students’.

Doctors should be more serious about performing their work and saving the patient than being nice and emotional. It is very hard for anyone to make critical time sensitive decisions when they let emotions get involved. Doctors must make an effort to keep from ever getting emotionally attached in order to make the life saving decisions needed.

A hospital is a sad place. If every doctor got upset and started crying over every sad case there would be no more doctors. If patient was dying and doctor came in to tell but then all of a sudden he started crying, wouldn’t that seem a bit wrong? Doctors are regular people just like everybody else. If they don’t learn to train themselves not to cry over every patient that would just be pitiful. What would one think if he/she saw their doctor read their chart and start crying? Caring for dying patients is part of every doctor’s clinical experience both during training and in subsequent practice. In every case, good of the patient should be the highest priority, not the feelings of the own. To deliver the best care, the doctors should not let emotions interfere with their decisions. They must be level-headed, detached, tough but all the while caring. The best care comes from a doctor who looks at a patient as a mathematician looks at a complicated equation.

Thank you!

– Prakash Chand
2007 Batch,RIMS,Ranchi

“Fashion Underneath the White Apron”

Disclaimer 1 : No comments about teachers,(you can double check) coz — (i) I wanna Pass,(ii) Not that they’d be reading this, (iii) What’s there to write about anyway, oops!

Disclaimer 2 : This is a work of fiction and any resemblance to the living or undead could very well be true.

Fashion and the medical profession don’t really make the best of friends. Let’s start off with what really distinguishes us lot from the rest — Aprons; A big part of our metamorphosis into Med. School students from the obscure of a medical aspirant.When you are a fresher here, the apron is your lone saviour — the only piece of clothing you’ve put that doesn’t send on-lookers into a hysterical fit of laughter. So here comes along the juniormost — hair dipped in mustard oil (10-20 dips), the length of hair maintained according to a stringent set of rules, set by “Bosses” who have an immaculate sense of diagnosing if someone crossed the limit by 10-3 of an inch.The white overalls underneath the apron isn’t any more fashionable than your average DAV 6th grader, and at least he’s allowed a belt and a better looking Tie.From the 2nd year students to the interns, you got pretty much the same dress code —Jeans & Tees. Trousers faded in all sorts of designs and places even embroidered (and men wearing them) the wardrobe picked up from all the “70% + 20%” off outlets at a handy 500 bucks (you go figure the original MRP) of course. There are variations, you know like the sudden surge in fashion graphs, the 1st year students create after surviving. The “Under Ragging Fashion Depression Syndrome”.Rock band tees are in vogue these days (Bon jovi to Bob Marrey, RHCP to megadeth).

All of this about casual wear. Well, at parties and such occasions, you’d see tuxedoes and churidar dresses (isn’t that way it’s called?) as well. A special mention about the females here. They are more often not that (not you, dear) bland ....... you judge them fashion-wise. And with the “Underneath the apron” heading of this article, they hardly qualify ‘coz they’re perennially hidden under the white coat and if they did not take it off in the 45°C temp. we got this summer, you never expect them to (“we are here to become doctors, Mr. wiseguy”.) Fine, whatever “suits” ya. PGs now — formals or casuals, they seem to be well dressed all the time (something to do with the 6th pay scale, I reckon). The stethos are entwined in different looks — “The snake around the neck” N’ “Earphone” look is also in. I better shut up, I’m beginning to sound like a fashion designer, yuck!

– Dushyant
2007 Batch,RIMS,Ranchi