Sunday, September 26, 2021
Speaking Scalpel
Sunday, August 29, 2021
RP में PR
Friday, July 9, 2021
महिला छात्रावास के सामने टूटी चारपाई
शीर्षक से लग रहा कि लेखक ने महिला छात्रावास की एक और टूटी हुई चीज पकड़ ली जैसे पिछले बार महिला छात्रावास की टूटी चारदीवारी थी।
खैर इस बार ये टूटी हुई चीज भी चारदीवारी न हो कर चारपाई है(लेखक को नंबर चार......से क्या है प्यार?)। लेकिन ये गर्ल्स हॉस्टल की ही संपत्ति है या नहीं इस पर कुछ नहीं कहा जा सकता(गुप्त सूत्रों से संपर्क नहीं हो सका है)।
महिला छात्रावास, जैसा कि पिछले बार बताया कि, हमेशा से लड़कों/पुरुषों के लिए एक कौतूहल का विषय रहा है चाहे तो आप इस बारे में बातें करते हुए पूरी रात गुजार सकते हैं। बस बातें मजेदार होनी चाहिए और छात्रावास की सिर्फ चारदीवारी पर केंद्रित न हो कर इसके मुख्य निवासियों पर होनी चाहिए(अरे भाई हम उन निवासियों की जीवनशैली और उनकी समस्याओं पर चर्चा की बात कर रहे हैं.......आप भी न कुछ भी सोच लेते हैं)।
अभी कुछ दिनों पहले मैं लोकडौन के बाद घर से वापस कॉलेज कैंपस लौटा।
ये भी अजीब ही विडंबना है हम मेडिकल के छात्रों की। परीक्षा न हो तो कॉलेज को कोसते हैं और परीक्षा होने की सूचना आये तो टालने के बहाने ढूंढते हैं (खुद ने पढ़ाई नहीं की इस बारे में सोचने पर विषादग्रस्त होने का खतरा रहता है)।
घर से लौटने पर कैंपस में एक मजेदार चीज देखी। अब ये तो सर्वविदित है कि युगों युगों से महिला छात्रावास के सामने वाला पेड़ ही हम मेडिकल के छात्रों की असली मंजिल PMT रही है। जिसके लिए ही कई लोग AIPMT अर्थात नीतू जी(NEET UG) को अपनी परीक्षा के नंबर से रिझाने में लगे रहते हैं(जी हाँ, सही सुना आपने। कोटा के बच्चों को जब अपनी जवानी के शुरू में "उनके" कांटेक्ट नंबर के लिए मेहनत करना चाहिए तब वो टेस्ट में आने वाले नंबर के लिए मेहनत करते हैं)।
हमारा कॉलेज PMT से आगे बढ़ कर कुर्सी/बेंच तक पहुंच गया है(हम नई पीढ़ी के बच्चे हैं)।
गर्ल्स हॉस्टल के सामने PMT की छाँव में हमेशा लोहे की आपस में जुड़ी हुई 3 कुर्सियों वाली बेंच लगी रहती है। वो भी वहाँ इसलिए रखी हुई है क्योंकि उसमें जो बीच वाली कुर्सी थी वो किसी ने उखाड़ दी थी। अब वो दो गज की दूरी(क्योंकि हम कोरोना के नियमों का समर्थन करते हैं......दूरी की मजबूरी) वाली दो कुर्सियाँ बन गई हैं जो अब जुड़ी हुई हैं और रखी हुई है गर्ल्स हॉस्टल के सामने। अक्सर वो कुर्सी हॉट सीट रहती है हंसों के जोड़ों (कपल्स) के लिए।
कल मजेदार चीज ये देखी कि उसके सामने अब किसी ने चारपाई डाल दी है वो भी एक पैर टूटी हुई। अब ये समझ नहीं आ रहा कि किसी ने चारपाई तोड़ कर वहाँ डाल दी या वहाँ डाल कर तोड़ दी! चारपाई टूटने का तो मतलब समझते हैं ना आप?(हम फ्रैक्चर की बात कर रहे हैं.......बाकी आप जो सोच रहे हैं वो भी हो सकता है।)
अब इस चारपाई के वहाँ पहुँचने का इतिहास और उसका वर्तमान में इस्तेमाल क्या है? इस बारे में जाँच समिति का गठन करेंगे। आपको जवाब पता हो या आप इस जाँच समिति के सदस्य बनना चाहते हो तो नीचे टिप्पणी कर के जरूर बताइएगा।
संदर्भ व शब्दकोष:
शीर्षक में "टूटी" का प्रयोग विशेषण(adjective) का तौर पर है या क्रिया(verb) के तौर पर?
महिला छात्रावास की टूटी हुई चारदीवारी- इसी ब्लॉग में पहले से प्रकाशित एक रचना
विडंबना- दुविधा/समस्या
विषादग्रस्त- डिप्रेशन
PMT - पिया मिलन ट्री
नीतू जी - NEET UG हमारे कोटा वाले गुरु जी के द्वारा दिया गया नाम
कोटा- आप अपने शहर और प्रिय शिक्षक का नाम सोच लीजिये
हंसों का जोड़ा- कोरोना काल में मेडिकल कॉलेज का हाल भाग 1
चारपाई टूटना- अब इसका अर्थ भी बताना पड़ेगा?
आपका वरीय/कनीय/मित्र
वरुण(२०१७ बैच)
©Inking Scalpel®
Thursday, July 1, 2021
पारिवारिक चिकित्सक दिवस
जिंदगी की पहली
शिशु चिकित्सक(माता),
मनोचिकित्सक(पिता),
आयुर्वेदिक चिकित्सक कड़वी दवाई वाले (भाई),
होमियोपैथी चिकित्सक मीठी गोली वाली(बहन),
हड्डी रोग विशेषज्ञ(चाचा मामा),
प्रसूति रोग विशेषज्ञ(बुआ मौसी),
सामाजिक रोग विशेषज्ञ सर्जन (फूफा मौसा),
गृहस्थी रोग विशेषज्ञ रेडियोलाजिस्ट(चाची मामी),
पारिवारिक रोग विशेषज्ञ डायग्नोस्टिक पारा क्लीनिकल(दादा नाना),
खान पान विशेषज्ञ डायटीशियन(नानी दादी)
और सब बीमारी का इलाज करने वाले औषधि विभाग चिकित्सक(मित्र बन्धु सहपाठी सीनियर जूनियर)
को चिकित्सक दिवस पर मेरा प्रणाम और धन्यवाद।
🙏🏻🤗😁
ध्यान देने योग्य बातें:
1.मित्रों को गुप्त रोग विशेषज्ञों की भी संज्ञा दी जा सकती है।
2. बाकी विभाग के चिकित्सकों की रिश्तों में तुलना अभी बाकी है।
3. कृप्या कमेंट कर के बताएँ कि आपने अपने परिवार के किस रिश्ते में किस विभाग के चिकित्सक को देखा है।
आपका वरीय/कनीय/मित्र
वरुण एकलव्य
(२०१७ बैच)
©Inking Scalpel®
Friday, May 28, 2021
महिला छात्रावास की चारदीवारी
महिला छात्रावास की चारदीवारी
प्रकृति ने भी महिला छात्रावास की चारदीवारी पर धावा बोल दिया। पहले अक्सर सिर्फ कुछ सज्जन पुरुष ही उस पर सेंध लगाया करते थे। उस टूटी हुई चारदीवारी की चर्चा आज रिम्स के हर एक प्रेमी जोड़े की चुहलबाजी का हिस्सा रहेगी। कुछ जोड़े उस टूटी हुई चारदीवारी की खिल्ली उड़ाएंगे तो कुछ जोड़े छात्रावास प्रबंधन को सुंदर शब्दों से नवाजेंगे। कुछ नए नए बने तोता मैना की जोड़ी को उसमें से आजादी की हवा आती हुई सी दिखेगी( फर्स्ट ईयर के प्रिय जूनियर्स)।
इस कैंपस के कुछ जिम्मेदार छात्र दिन में छात्राओं की सुरक्षा को लेकर चिंतित हो कर शायद अपने दोस्तों संग विस्तृत चर्चाएं भी करेंगे लेकिन रात होते होते वो भी उस गिरी हुई पेड़ की टहनी की ऊंचाई नापते हुए नजर आएंगे। अरे भाई आज बारिश हुई है तो ठंड तो लगेगी ही न तो बस उसके लिए। आप भी न जाने क्या क्या सोच लेते हैं।
यूं तो महिलाओं का छात्रावास लड़कों के बीच अक्सर ही कौतूहल का विषय रहता है। खैर इनमें भी लड़कों का क्या कसूर। ये तो मानव की जिज्ञासा ही है जो हर कैद चीज का रहस्य जानने को लालायित रहती है और कुछ हॉर्मोन्स का भी इनमें योगदान होता है(अरे भाई मेडिकल कॉलेज में पढ़ते हैं तो थोड़ा बायोलॉजी का ज्ञान नहीं पेलेंगे तो कैसे पता चलेगा)।
खैर लड़कियों के छात्रावास में प्रवेश करने का अनुभव तो मुझे कभी मिला ही नहीं लेकिन गुप्त सूत्रों(नाम लेंगे तो देशद्रोही साबित हो जाने का खतरा है) से पता चला है कि ये भी एक अलग ही दुनिया होती है। ऐसी दुनिया जिसमें चारो तरफ सिर्फ लड़कियाँ होती है। पुरुष प्रजाति के नाम पर बस गार्ड जी और मेस वाले भैया दिखते हैं। वैसे तो इस दुनिया किसी भी बाहरी व्यक्ति(चाहे वो अंदर रह रही लड़की का पिता ही क्यों न हो) का आना जाना सख्त मना है खासकर तब जब वो पुरुष हो।
लेकिन फिर भी अक्सर दूध वाला, न्यूज़पेपर वाला, पानी वाला, आदि का आना जाना लगा रहता है(शायद ये लोग पुरुष ही नहीं............. महापुरुष हैं)।
कई बार तो हमारे तरफ़ के लड़के दूध वाले और मेस वाले भैया को पटाने में लगे रहते हैं कि भैया हमको भी एक दिन के लिए खाना दूध पहुंचाने के काम पर रख लो। बेचारे गरीब छात्र पार्ट टाइम जॉब की कोशिश कर रहे हैं (आपने कुछ और सोचा?)।
खैर एक बात तो है कि अंदर रहने वाले पुरुष प्रजाति के सदस्य बड़े मौज में रहते हैं। जब चाहा जिसको टोक दिया डांट दिया वार्डन को कॉल करने की धमकी दे दी।
(स्पेशल टिप- हालांकि गुप्त सूत्रों से पता चला है कि इन लोगो को एक डब्बा मिठाई और एक बोतल दारू से आराम से पटाया जा सकता है।)
वैसे इस चारदीवारी की कुछ दिन पहले ही मरम्मत हुई थी। सुरक्षा व्यवस्था के नए पुख्ता इंतजाम हुए थे लेकिन वो शायद दरवाजों के आसपास के चार ईंटों की ही सीमा तक सीमित रह गई थी शायद पैसों की कमी हो गई होगी(या फिर नियत......)।
खैर प्रकृति से पहले भी कई बार इस चारदीवारी पर सेंध मारने की कोशिशें हुई हैं। कई कोशिशें तो कामयाब भी हो गई और किसी को कानों कान खबर तक नहीं हुई।
कुछ अफवाहें तो कहती हैं कि इस तरह की पहली लोकप्रिय सफल कोशिश हमारे कॉलेज के ही एक शिक्षक के द्वारा की गई थी और वो भी तब जब वो यहाँ अपने छात्र जीवन का मजा ले रहे थे। अब भी जब उनको देखता हूँ तो लगता नहीं है कि यही वो इंसान है जिसने ऐसा दैवीय चमत्कार दिखाया होगा। खैर गुरुजी के चरणों में दंडवत प्रणाम क्योंकि उन्होंने शालीनता से सभ्यता की मर्यादा का मान रखते हुए अंदर गए और बिना किसी को कोई परेशानी दिए बाहर भी आ गए।
वैसे गए तो हम भी एक दो बार हैं लेकिन बाकायदा गार्ड से बात कर के और वो भी मेडिकल इमरजेंसी के कारण (देखिए हम शरीफ़ हैं........वो बात अलग है कि वापसी में बाइक खराब होने का बहाना कर टहलते हुए लौट थे)।
लेकिन यार जो कहो अंदर का नजारा सच में लुभावना होता है। एक तो चारो ओर फूलों(सच के फूलों की बात कर रहा हूँ, कोई उपमा नहीं है) की क्यारियां लगी हुई है और सुबह की सैर के लिए रास्ते बने हुए हैं। रात में भी अंदर लगभग हर जगह रौशनी रहती ही लेकिन फिर भी कई ऐसी जगहें हैं जो अगर इस चारदीवारी के बाहर रहती तो दिन क्या रातों को भी गुलजार रहती।
वैसे तो कई बार हमारे क्रिकेट खेलने वाले बंधु चारदीवारी के अंदर जा चुके हैं लेकिन उन्हें भी 15 कदम से ज्यादा अंदर जाने का अनुभव शायद ही मिला हो। लेकिन ये बात तो रहती है कि अंदर गई हुई गेंद को ढूंढने में अक्सर ज्यादा समय लग जाता है, शायद गेंद किसी झाड़ियों में खो जाती होंगी(या फिर नजरें..….)।
आपका वरीय/कनीय/मित्र
वरुण(2017 बैच)
©Inking Scalpel®
Saturday, March 13, 2021
कोरोना काल में मेडिकल कॉलेज का हाल भाग-२
दूसरा भाग:
चार पाँच सीनियर लड़के एक स्वीट्स एंड स्नैक्स की दुकान पर खड़े थे और वहाँ एक होस्टल का जूनियर अपने डे स्की बैचमेट के साथ आ जाता है। सभी के मुहँ पर मास्क है। डे स्की बैचमेट अपने दोस्त को छोटी सी ट्रीट दे रहा होता है।
डे स्की जूनियर: "चल ना बे! क्या सोच रहा है?"
होस्टल वाला जूनियर: "भाई रुक जरा, एप्रोन के बटन तो लगाने दे।"
डे स्की जूनियर: "अरे चल ना यार, एक तो इतनी गर्मी है ऊपर से तू बटन लगा रहा। रहने दे ना, वैसे भी कौन सा यहाँ कोई सीनियर है? " फिर रुक कर दोबारा बोला:
"चल आज मैं तुझे पार्टी देता हूँ और ये पार्टी उन कंजूस सीनियर की तरह नहीं है कि रात भर जम के पेला और फिर बस एक समोसा और कोल्ड ड्रिंक दे कर भेज दिया।"
तभी होस्टल वाले जूनियर की आँखें सीनियर्स की घूरती आँखों से टकराई।
(अब यहां से बातें आंखों के इशारे में होगी)
सीनियर ने मन में सोचा- "ई कौन से चींटी महल का तोप है बे? ई हमलोग को पहीचानता नहीं क्या?"
होस्टल जूनियर ने आंखों से विनती की- "माफ़ कर दीजिए बॉस! आइंदा से ऐसा कभी नहीं होगा।"
सीनियर ने मन में सोचा- "इसको तो बेटा अब अलग से बुलाऊँगा परिचय सत्र में, मुर्गे की तरह बांग दिलवा कर अंडा देते हुए हीरोइन की तरह नाचेगा ये अब तो।"
होस्टल जूनियर ने फिर से इशारों में विनती की- "प्लीज प्लीज बॉस हमको छोड़ दीजियेगा । मम्मी कसम, हम अब कभी भी इसके साथ नहीं घूमेंगे। गलती हो गया बॉस।"
सीनियर ने होस्टल वाले जूनियर को आँखें तरेरी- "तू तो साला पवनवा है........ तुमको तो हम शरीफ समझते थे लेकिन तुम भी.........रुको बेटा अब पूरा बैच को बुलाएंगे परिचय सत्र में।"
विशेष बिंदु- कृप्या इसे सिर्फ हास्य व्यंग्य ही समझे, जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है (केवल बाहर वालों के लिए, बाकी अंदर की बात तो कुछ और ही है)।
इस भाग पर टिप्पणी देंगे तभी अगले भाग का प्रकाशन होगा।
धन्यवाद
आपका वरीय/कनीय/मित्र
वरुण(2017 बैच)
©Inking Scalpel®
Friday, November 20, 2020
कोरोना काल में मेडिकल कॉलेज का हाल भाग-१
प्रथम भाग:
दो वरीय हंसों का जोड़ा (अर्थात सीनियर कपल) मास्क लगाए हुए कॉलेज कैंपस में विचरण कर रहा है और बगल से मास्क लगा कर एक कनीय चूजा (अर्थात जूनियर लड़का) गुजर रहा है।
बॉस(वरीय हंसों के जोड़ा में पुरुष प्रजाति ) की सोच: ई नमूना कौन है बे? मास्कवा पर कुछो समझे नहीं आ रहा। साला टुकुर टुकुर इधर देख रहा है। अच्छा साला पवनवा है लगता है, इसका तो अलग से खबर लेंगे रात में बुलाएंगे इसको परिचय सत्र में। साला ढंग से 1 महीना हुआ नहीं है और हमरी बंदी पर नजर मार रहा है।
मैडम(अब इनके बारे में क्या बताएं, नशीली आंखों से ही खूबसूरती झलकती है) की सोच: न जाने काहे बुला लिया है मिलने को और अब बुलाया भी है तो उधर लड़का लोग का हॉस्टल का दरवाजा तरफ ही देख रहा है, ई नहीं कि हमरी ओर भी जरा देख ले। कितना कुछ पढ़ना है, परीक्षा नजदीक है। अच्छा ......उ तो कोई जूनियर लड़का जा रहा है ना, इधर बार बार काहे देख रहा है उ। ई सब लड़का लोग का अलगे नाटक चलता रहता है। अब हमसे 2 मिनट और ये कुछ नहीं बोला तो हम चल जाएंगे, हाँ नही तो।
कनीय लड़का की सोच: अच्छा है कि मास्क लगा लिए हैं, अब मस्त जीन्स टीशर्ट पहिन कर पर्फ्यूम मार कर फोकस में घूमेंगे, कौनो पहचानेगा भी नहीं........... अरे राम! राम! राम! ई किसको देख लिए भाई? .......साला लंगूर के हाथ में अंगूर। ई तो वही बोसवा है ना जो आँखें दिखा कर डरा देता है। इसको तो साला सबका नाम तक याद रहता है, लगता है कि दवा छोड़ कर हमहि लोग का नाम रटता रहता है। ई देखो तो कितनी खूबसूरत और मासूम मैडम को घुमा रहा है और एक हमरे बैच में सब की सब नकचढ़ी और बहन जी भरी पड़ी हैं। ना अक्ल न शक्ल और भाव खाती है किलो भर का जैसे भाव से ही पेट भरेगी। अरे बाप रे! ई बोसवा तो इधरे देख रहा है। भाग रे पवनवा मास्क टाइट कर के नहीं तो रात में पैंट ढीला और गीला दोनों करवा देगा ई बोसवा।
आपकी मेरी बातें: बस अब आपके प्यार का इंतजार है, मिलेगा तो इसके और भी भाग लिखूंगा अन्यथा इसका सफ़र यहीं तक था। धन्यवाद। कृप्या टिप्पणी करें कि आपको इसमें क्या पसंद आया।
आपका वरीय/कनीय/मित्र
©Inking Scalpel®
Wednesday, July 1, 2015
कितना पढ़ेगा रे - the xaam saga in medical college
"कहाँ कुछ पढ़े हैं? सब तो बकिये है बेटा!'
"KC मत करो. बेटा सब तो रंग दिए हो और हमको उल्लू बना रहे हो "
"कहाँ रे!एक ही तो रीडिंग किये हैं. कहाँ कुछ याद रहता है?'
"अरे तो कौन मारे honours लाना है, बस पास हो जाना है और क्या?"
"हाँ! हाँ! बोल्बे करोगे. बेटा जब मार्क्स आएगा तो मालूम चलेगा. मेरा तो विकेट गिर जाएगा. इस बार suplee पक्का है. बेकार आ गए मेडिकल कॉलेज में. साल भर पढो और फिर क्साम टाइम भी पढो. ....मेरा दोस्त लोग इंजीनियरिंग कॉलेज में है, साल भर अंग्रेजी फिल्म देखता है और एग्जाम टाइम में नोट्स रट के पास हो जाता है.किस्मत अपनी अपनी. मेरा भी हुआ था AIEEE में , किस्मत में कुत्ता **** था कि छोड़ के आ गए यहाँ. कितना अच्छा कांसेप्ट था मेरा फिजिक्स में. यहाँ तो बायोलॉजी में बस रटते रहो. हमसे तो रटा नहीं जाता है भाई. अब क्या करें? मेडिकल साइंस में और है ही क्या? बिना रटे तो कुछ भी संभव नहीं है यहाँ."
ऐसा ही कुछ माहौल होता है, हर बार, हर बैच के साथ,हर एग्जाम के पहले, लगभग इंडिया के हर मेडिकल कॉलेज में. सब हॉस्टल की लॉबी में बदहवास से भागते नज़र आते हैं. और सबसे वही चिर परिचित सवाल-" कितना पढ़ेगा रे?" और वही चिर-परिचीत जवाब. मगर कमाल है की कोई बोर नहीं होता.
to be contd...
Thursday, July 17, 2014
LETTER TO AMIR KHAN
“NOT ALL DOCTORS ARE GREEDY”
2. Does any school waive its fees for a doctor's kid?
3. Does a doctor get any special tax rebate?
4. Does the govt. gives permanent jobs to doctors in village?
5. Does the court convict the people who attack doctors on duty?
6. Does a doctor get any discount on railway, airplane
ticket, or petrol?
7. Is the doctor responsible for poor health infrastructure or the
politicians whom you elect on the basis of caste, religion or quota sops?
8. Does Amir Khan treat u when you are ill?
9. Why should a doctor not be paid well for saving your life? Or
is it that your life is worthless?
10. Is Amir Khan promoting good health by doing ads for
coca-cola and earning millions?
11. Why should a doctor sacrifice his life and happiness
for you? What have u done to deserve it?
a. Number of doctors beaten on duty by goons from various political outfits in government hospitals in UK and India in last 10 years, and also the number of people convicted for such crime.
night just to ensure that their patients get the best possible treatment..The 'BAD' doctors should be punished and we all can come together to ensure we do not encourage such malpractices
You were asking Dr. Devi Shetty whether he can do humanitarian work and Earn at same time? This is like asking Amir Khan or Shahrukh khan their income and generalizing it for every actor in the industry (Even junior artists). Sir, just as there are only few Khans and Kapoors,There are even fewer Devi Shetty and Naresh trehan who run their chain of Multi-specialty hospitals spread all over the country. See what it takes to become a doctor and then give such “Geeta-Gyan”.
B. After above 6 and half years of Graduation, SERVICE BONDS RANGING FROM 2 YEAR TO 10 YEAR
c. After this above 10 and half years, 3 more years of Super specialty, followed by 1 year of Govt job or a Bond of Rs. 2 Crore. And the seats are so few with tough competition, there tends to be a gap of a year or two in preparing for various entrance exams.
2. Try to maintain the govt. hospital up to the standard of private sectors. And this is the job of govt. The Govt. should spend 6-8% of GDP ON HEALTHCARE and a part of which should also be committed to the research and development of newer drugs.
3. Public too bears the responsibility to maintain the govt. property like hospital.
4. Stop corruption at top level that eats the major% of hospital fund. No politician should be allowed to be associated with any private medical colleges.
5. Give doctors the proper social security.
6. The primary school education must include more and more health related topics because who can be fooled? Only those who don’t know about It.! So the general public should be educated well about common diseases and the 'acceptable' qualifications of the doctors
7. If treatment of better quality (at lower cost) is available at govt. hospitals, why would we go to empty our pocket at corporate hospitals?
8. Public should know that good treatment doesn’t come just by money.
9. ' BAD' doctors indulging in malpractices should be suspended for life. We need a strong regulatory authority to publish expected treatment 'protocols' and punish doctors found to be doing unethical practices.
11. Have regulation over pharmacy companies. They are the real money maker. Doctors are just the apparent culprit. Regulatory authorities should also keep a check on the quality of drugs being manufactured and at the same time 'sold' at the local chemist.
13. Doctors too r human being. They too need money for survival. So people should not exaggerate the GODness of them. But yes it’s true that bad intention is always a shin either in a doctor, a businessman, an actor, politician, a bureaucrats or a common man!
Put my papers on my chest,
N tell my mom I did my best,
N tell my dad not to bow,
He will not get tension from me now,
Tell my brother study perfectly,
Keys of my scooty will b his permanently,
Tell my sis don’t b upset,
Her sister will not rise after this sunset,
Don’t tell my frndz they r hearties,
N start to ask for parties,
Tell my love not to cry..coz
" I'M A DOCTER..
BORN TO DIE...”
Sunday, February 10, 2013
copra- life or poison
-BY Dr. Rohit kumaar 96 batch
published in SPRIHA 2001-02 issue
"बनवारी हो, रहरी में बोलेला सियार": गाता हुआ रामसरन तपती दोपहरी में सूरज को चुनौती देता अपने खेतों की रखवाली कर रहा था. तभी उसकी नज़र बरगद के जड़ पे बैठे जोखू पर पड़ी. जोखू सर झुकाए, बेबस लाचार ऐसा लग रहा था मनो उसे गोहत्या का पाप लग गया हो. रामसरन पुच बैठा-"का ह जोखू भाई...का हाल बा...?" जवाब में जोखू ने केवल सर उठाया. उसके अश्रुपूरित आँखों और चेहरे के काले पद गए झुर्रियों से इतना तो स्पष्ट था कि वह किसी भारी विपत्ति का शिकार हो गया है. भर्राए गले से उसने बताये की उसका बेटा जामुन के पेड़ से गिर गया है और अब तक बेहोश है. डॉक्टर इलाज़ करने से पहले CT scan कराना चाहते हैं. अब उसके पास इतने पैसे तो हैं नहीं की वह ये जांच करा पाए. सरकारी अस्पताल में तो यह जांच होता भी नहीं. राम्रासन पूछ बैठा-"लेकिंज ५ साल पाहिले जब रघुआ के बेटा बेहोश भेल रहे तब त बिन जांच के ही इलाज़ हो गेल रहे?". जोखू का जवाब था-"डॉक्टर साहब कहलन कि उनका COPRA के डर बा".
"ई COPRA का ह भाई"
पुरे गाँव में स बात पे बहस छिड़ गयी. आखिर यह क्या चीज़ है? इससे इतने बड़े बड़े भगवान् के दुसरा रूप कहे जानेवाले डॉक्टर लोग भी डरने लगे?किसी के अनुसार यह उसका बहाना होगा, या फिर कोई जांच में मिलने वाले कमीशन की बात करता.
शहर में पढने वाले भोलू ने बताया कि उसने COBRA का नाम सुना है जिसका काटा हुआ पानी भी नहीं पी पाता है. तो हो सकता है यह COPRA भी उसी का कोई भाई बंधू होगा. अंत में लोगो ने निष्कर्ष निकाला- यह ऐसा कानून है की फिर डॉटर भगवान् नहीं रह जाता, उसे भी व्यापार के दायरे में दाल दिया जाता है.
जोखू के मन में अंतर्द्वंद चल रहा था. इस क़ानून से किसको लाभ है? डॉक्टर और मरीज़ दोनों परेशान हैं. अगर कानून डॉक्टर से ऊपर है तो फिर इलाज़ कचहरी में होना चाहिए? कम से कम कानून इलाज़ नहीं करता पर जांच ही फ्री में करा देता. भाई, कोबरा के काटे का इलाज़ है पर इस क़ानून का कुछ नहीं. यह तो बिना देखे ही काटता है.
जोखू देख रहा था बेहोश बेटा मरणासन्न हो रहा था, copra का विष चढ़ता जा रहा था. उसकी कोई भी सांस अंतिम हो सकती थी.
मानवता की बेड़ियों में जकड़ा सिसकता एलोपेथिक डॉक्टर समाज
-by Dr. Mrityunjay sarawagi. M.S. dept of surgery
published in SPRIHA 1999 issue.
सफ़ेद कोट , गले में आला, इलाज़ की चुनौतियों एवं शल्य क्रिया के रोमांच से अभिभूत प्रत्येक विद्यार्थी अपने अथक परिश्रम से मेडिकल कोल्लेज में दाखिला लेता है. ५-८ वर्षों के तपस्या के बाद वह स्वतंत्र रूप से व्यवसाय से जुटता है.इस व्यवसाय के जोखिमो से और रोज़ की उतरदायित्व से उसे पता चलता है की हर वह चीज़ जो चमकती है सोना नहीं होती.
आज व्यवहार में आने वाली सभी चिकत्सा पद्धतियों में एलोपेथिक सबसे प्रमाणिक चिकत्सा प्रणाली है.सच ये भी है की इस चिकित्सा पद्धति की अपनी परिधि , लक्ष्मण रेखाएं, एवं जटिलताएं हैं. पाश्चात्य विज्ञान पर आधारित इस चिकित्सा का प्रचलन भारतीय सामाजिक एवं आर्थिक परिप्रेक्ष्य में चिकित्सक के समक्ष कई बार किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति उत्पन्न कर देता है.
निकट के समय में चिकित्सक ये अनुभव करने लगे हैं की मरीज़ के अभिभावकों की अपेक्षाएं , आक्रोश,अविश्वास एवं असंतोष की भावना बढ़ने लगी है.तो क्या चिकत्सकों के मूल्यों का ह्रास हुआ है? क्या इस स्थिति में केवल चिकित्सक उत्तरदायी हैं?यह सच है कि सामाजिक मूल्यों में कमी का असर इस व्यवसाय पर भी पडा है. कुछ चिलित्सक अपने क्रियाकलापों से इसे कलंकित कर रहे हैं. लेकिन इनकी संख्या कम है. इस संख्या मे वृद्धि MBBS degree धारकों से नहीं है, बल्कि अल्पकालिक एवं अपर्याप्त योग्यता वाले वैसे चिकित्सकों से है जिन्हें एलोपेथिक शिक्षा का विधिवत ज्ञान नहीं है. और जो अपने मरीज़ के इलाज़ में गलत तरीको का प्रयोग करते हैं.
आज एक तरफ तो मानवता का ढोल चिकित्सक के गले से बंधकर लोग उन्हें अपमानित एवं प्रताड़ित करने से भी नहीं चुकते. वहीँ साथ साथ COPRA-consumer protection act की जंजीरों में हमें जकड दिया जाता है. इस स्थिति में हम सिसक तो सकते हैं, प्रतिवाद नहीं कर सकते हैं. यदि इस चिकत्सा विधि में विस्वास रखने एवं लाभान्वित होने का अधिकार तो मरीज़ को है तो इसके दोषों एवं इसकी सीमा रेखाओं को भी उन्हें ही समझना एवं स्वीकार करना होगा. चमत्कार अलाद्दीन का चिराग या संजीवनी बूटी जैसा इलाज़ इस पद्धति की चिकित्सा विधि में नहीं है. हम संवेदनहीन नहीं हैं,लेकिन अप्रत्याशित परिणाम, अभिभावकों की असामयिक, अनुचित एवं अपनी सुविधानुसार मांगों की पूर्ति नहीं होने पर मानवता के कटघरों में खड़ाकर जिस प्रकार हम अपमानित और पप्रताड़ित हो रहे हैं उस मानसिक वेदना एवं क्षोभ का आभास कर पाना शायद दूसरों के लिए संभव नहीं है.
चिकत्सा ऑफिस में पड़ी कोई फाइल नहीं है जिसपर दबाव डालकर कोई मनोकुल आदेश पारित कराया जा सके, यह परस्पर विश्वास एवं सहयोग से ही संभव है. आनेवाला समय एलोपेथिक चिकित्सक के लिए और जटिल हो सकता है, साथ ही मरीज़ विशेष कर गंभीर रूप से बीमार मरीजों के इलाज़ में परेशानियां आ सकती है. अगर हम आज जागरूक होकर इस व्यवसाय को बनाम करने वालों का बहिष्कार शुरू न करें एवं लोगों को इस चिकत्सा विधि की वस्तुस्थिति से अवगत न करायें.
Saturday, January 26, 2013
lecture theatr-a description of our classroom scene
आदमियों की एक आदत होती है,जहाँ भी गए, जो भी देखा,या जो कुछ भी मिला उसमे कुछ न कुछ बुराइयां जरुर निकालेंगे अपनी बुद्धि का प्रदर्शन करने के लिए. मैं भी एक इंसान ही हूँ और इसलिए ये सद्गुण मुझमे भी व्याप्त है. यूँ तो बुराई करने को हज़ारो चीज़ें है इस जहाँ में मगर मैं उस चीज़ पे ज्यादा मेहरबान हूँ जो मुझे सब से ज्यादा अज़ीज़ है और अजीब भी.
जी हाँ, आपने बिलकुल ठीक समझा. ये है हमारा क्लासरूम. यानी lecture theatre. सही मायने में भी यह किसी ड्रामा थियेटर से कम नहीं यानी नौटंकी से भरपूर. आइये नौटंकी का पात्र परिचय सेगमेंट शुरू करें.....
1.students- future doctors, future.....
2. assets of students
3. teachers-professors.doctors
4. assets of teachers
5. attendance
6. lecture
so these were the headlines of the hour.
now in details...
1. STUDENTS-
इस नौटंकी थियेटर में निम्नलिखित प्रकार के विद्यार्थी पाए जाते हैं...
१. जिनकी नींद हॉस्टल में पूरी नहीं हो पाती
२. इन्हें कम सुनाई देता है यानी पीछे बैठने वाले,....शायद पीछे साफ़ आवाज़ पहुँचती हो
३ . एकाध गो आगे बैठ के मुड़ी हिलाने वाले......क्लास की इज्ज़त के अंगरक्षक
४.. सज धज के क्लास में ज़रा देर से आने वाले ...सही में इन्ही के सहारे तो समय कटता है.
५..इनकी सजावट को निहारने वाले
2. ASSETS OF STUDENTS-
a. Earphone- स्टूडेंट्स की अहम् जरुरत है...बुढापे की लाठी है..नंगे का लंगोटा है..डूबता के लिए तिनके का सहारा है
जहाँ एक तरफ टीचर्स के मधुर वचनों से बचाता है वहीँ batchmates द्वारा बनाये गए मजाको से भी अनजान रखता है, अपने antisedative action के लिए भी यह काफी मशहूर है. लेकिन इसके कई साइड इफेक्ट्स भी हैं .जैसे attendance छुट जाना या फिर किसी दुसरे के रोल नंबर पे आवाज़ दे देना इत्यादि....
b.टोपी- यह गंजो के लिए लंगोटी है , हाँ भाई वही इज्ज़त ढंकने वाली. कुछ लोग इसका प्रयोग आगे झुक कर नींद मर्लेने के लिए भी करते हैं. या फिर नज़ारे बचाकर किसी को निहारने के लिए भी ये अक्सर प्रयुक्त होता है.हाँ एक बात और, अगर सुबह देर से नींद खुली हो और बिना नहाये क्लास आना पड़े तो भी यह बहुत उपयोगी है...
c.मोबाइल फ़ोन -यह सुदर्शन चक्र है. टारगेट पे अचूक निशाना लगाता है. नर या नारी...सभी छात्रों को यौवन को सही मायने में enjoy कराने में यही एकमात्र मददगार है. रूमानियत महशुश करना हो, नए रिश्तो को पनपाना हो, sms यानि "सरल मोबाइल सन्देश " भेजना हो या टीचर्स को मिस कॉल मर कर तंग भंग करना हो....तो हर मर्ज़ की बस एक दवा है ---मोबाइल. हाँ धार्मिक विडियो देखने और दिखाने में भी यह काफी प्रशिद्ध है.
d. कलम - लेखनी ...नोट्स लिखना इसका सबसे तुच्छतम प्रयोग माना जाता है. सबसे महत्वपूर्ण प्रयोग है कान खुजलाना, सामने वाले की पीठ में उकेत्तना , कार्टून बनाना ...बाकि हर कलाकार की कबिलियत पर......
e.बेंच-डेस्क - महत्वपूर्ण कार्यो का निष्पादन इसके बिना असंभव प्रतीत होता है. सतयुग से ही इसका प्रयोग ड्रम बजाने में, कार्टून बनाने में, धार्मिक चित्रकारी में, इसके निचे छिपकर मोबाइल काल अटेंड करने में, इत्यादि अनुशंधानो में होता रहा है.
3. TEACHERS-
हमारे यहाँ यानि रिम्स में योग्य शिक्षकों की कोई कमी नहीं है. एक से बढ़कर एक विद्वान्,आचे clinicians,doctors, और अनुभवी प्रोफेसर हैं हमारे पास. कईयों के पास तो विदेशी डिग्री भी है.शायद इसलिए इनमे से कई हिंदी बोलने में अपनी डिग्री की बेईज्ज़ती समझते हैं.कुछ तो यहाँ तक कहते हैं-" u are a medico, u must try to live with english. All of u note it, when i speak then i speak, when u speak then u speak, dont speak in between between." और इसलिए वार्ड में हम मरीजों से पूछ बैठते हैं -"ऐ जी सरसती देवी, जपला से आये हैं, ok then plz let me know about severity of ur angina..." और मरीज़ बेचारे हक्का बक्का. कुछ कान्वेंट स्कूल के प्रोडक्ट्स ने एक बार हिंदी में मरीज़ से पूछताछ करने की ज़हमत उठाई. और एक महिला से पूछने लगे-"हाँ तो आपकी महामारी कैसी है?????" अब उस ग्रामीण महिला को क्या पता की मेम साहब माहवारी को महामारी बोल रही है ..अब अपनी भाषा की अल्पज्ञता का ये नमूना......खैर...अंग्रेजी makes us feel superior then others....इसलिए तो हमलोग फाइनल मौखिक परीक्षा के पहले english spoken class join कर लेते हैं.
किसी किसी टीचर की आवाज़ इतनी अच्छी होती है की पहले बेंच पे बैठ कर हमें अपनी कानो पर विस्वास ही नहीं होता. हो सकता है कि maaleus and incus में demand hypertrophy हो जाये.
हालाँकि हमारे प्रोफेसर डॉक्टर के पास समय का सर्वथा अभाव रहता है फिर भी वे अपना कीमती समय हमें देते हैं, वाकई ये गर्व की बात है.उनकी व्यस्तता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि क्लास के बीच में ही उन्हें कितनी ही बार फ़ोन पे बात करना पड़ता है. और उनके वार्तालाप पे हम तरह तरह के निष्कर्ष निकलते रहते हैं, जैसे-"जरुर बीबी का फोन होगा....नहीं रे कोई आइटम भी तो हो सकती है....न रे मरीज़ फंसा रहे होंगे...कम्पनी का भी तो हो सकता है...ना ना medical representative से होटल बुक करवा रहे होंगे...."...
कुछ प्रोफेसर को तो chalk allergy होती है, कारण हमारे श्याम पट यानि black board का अति सुविधासंपन्न होना भी हो सकता है, या फिर हम क्षात्र इतने कुशाग्र बुद्धि है कि शिक्षक्मुखाग्र से निकले शब्द रूपी प्रसाद को कर्ण पथ से निगलने को आतुर रहते हैं हम, और शायद इसलिए लैपटॉप के ज़माने में भी श्रुति स्मृति ज्ञान विधि को ही बेहतर समझते हैं और इसलिए उन्हें श्याम पट पर कुछ भी लिखने की जरुरत ही नहीं पड़ती.
4. ASSETS OF TEACHERS-
तो हमारे क्लास रूपी स्टेज में शिक्षकों को अपनी कला प्रदर्शन के लिए जिस अत्यंत महत्वपूर्ण यंत्र की आवश्यकता पड़ती है वो है विद्युत् चालित प्रक्षेपक यानि "PROJECTOR". इसके भी दो प्रकार है, एक मल्टीमीडिया वाला यानि HIV- HIGHLY IMPORTED VARIETY का और दुसरा बाबा आजम के जमाने से चला आ रहा....
बीच लेक्चर में अगर बिजली रानी मायके हाली जाये तब मनो ज़िन्दगी थम जाती है. हाई-फाई डिस्कसन से हम तुरंत साधारण बातों की पढ़ाई करने लग जाते हैं, या फिर ऐसे ही गप्पे हांक कर क्लास किसी तरह ख़त्म कर दी जाती है.
5. ATTENDANE-
यह शब्द आंग्ल भाषा के शब्द ATTENTION से बना हुआ प्रतीत होता है,जिसका शाब्दिक अर्थ होता है ध्यान देना. मगर हमारे यहाँ यह एक MISNOMER है. अर्थात PHYSICAL AND MENTAL PRESENCE की बजाय सिर्फ PHYSICAL PRESENCE को प्राथमिकता दी जाती है. हालाँकि आपके दोस्तों की दुआ से आप इस से भी निजात पा सकते हैं. मगर उसके लिए जिस रासायनिक अभिक्रिया की जरुरत पड़ती है उसका नाम है- प्रॉक्सी..
PROXY- It is a type of social ativity, done in good faith to ensure the dual presence of his client in the future university exam as well as by that time outside the class.
वैसे तो ATTENDANCE को MCI ने MUST बना दिया है, क्लास आना अच्छी बात है मगर कुछ प्रश्न अभी भी उत्तर की तलाश में sms बनकर भटक रहे हैं.
१. आखिर क्यों यह बताना पड़ता है की attendance जरुरी है ?
२.क्या हर ८०% attendance वाले का एग्जाम अहह ही जाता है?
३.क्या प्रॉक्सी लगवाने वाले हमेशा फेल ही होते हैं?
४.आखिर प्रोक्सी की जरुरत ही क्यों पड़ती है?
५.जहाँ एक तरफ attendance कम होने पर , चाहे कोई भी मजबूरी हो, हमें sent-up होने से रोक दिया जाता है, वहीँ दूसरी तरफ over-attendance होने पर अगले साल उसका कोई भी बोनस या फायदा नहीं मिलता.ये तो सरासर अन्याय है..?
6. LECTURE
हमने सुन रखा था कि स्कूल में क्लास होते हैं और कॉलेज में leture. मगर आज तक हमें ये अंतर नहीं समझ में नहीं आया की class and lecture में अंतर क्या है? यहाँ भी हमें definitions रटवाए जाते हैं तोते की तरह,notes लिखवाए जाते हैं पहले क्लास के बच्चे की तरह.शिक्षक अपने अनुभव और बारीकियां profess करने की बजाय अपने स्लाइड्स की reading करना ज्यादा पसंद करते हैं. कुह लोग तो पूरी की पूरी किताब हनुमान चालीसा की तरह बिना किसी पड़ाव के धाराप्रवाह बहा कर चले जाते है...
एक टीचर को सिर्फ एक टॉपिक मिलता है पढ़ाने के लिए.वो भी सदियों से उसी को पढ़ाते आ रहे हैं. मगर ताज्जुब वे हर साल एक ही नोट्स को लिखवा भर देना अपना फ़र्ज़ समझते हैं, भले उनकी कर हर साल बदल जाए मगर हर साल उस टॉपिक पे वही चुटकुला चलता है,हर बार लड़के वही उबाओं कहानी सुनते हैं..और नोट्स भी वही...जिसे कुछ छात्राएं बड़ी म्हणत से छपने का काम करती हैं, और हम उनसे फोटो कॉपी करवा लेना अपना परम कर्तव्य समझते हैं.इन नोट्स को पढने की कोशिश सिर्फ एग्जाम के पहले की जाती है, क्यों की ऐसा अंधविश्वास है की इन्हें लिखने से एक्साम में पुरे मार्क्स मिलते हैं.
एक टीचर को सप्ताह में एक ही क्लास मिलता है, यानि एक सप्ताह में ६-७ टीचर अलग अलग टॉपिक शुरू कर देते हैं. मसलन नज़ारा ऐसा होता है कि एक तरफ हम neoplasia का definition रट रहे होते हैं वहीँ दूसरी तरफ साथ साथ हमें melanoma surgery भी पढनी पड़ती है और अगले तरफ prostate का ट्रीटमेंट.
क्लास में कव्वाल्ली की टीम की तरह लड़के-लड़कियों के अलग अलग बैठने पे तो हर साल टीचर्स अपनी कहानिया सुनाते हैं-"हमारे समय में तो ऐसा नहीं था..बहुत फ्रैंक था हमारा बैच ...साथ सिनेमा देखने जाते थे..."
ज्यादा पोस्ट-मार्टम नहीं करना चाहिए, वरना कल को गए जब मेरा p.g. में नहीं होगा तो लोग यहि कहेंगे की "ई लड़का साल भर खली यही सब research किया है तो रिजल्ट कैसे होगा?????" इसलिए पाप ज्यादा नहीं बटोरते हुए अलविदा. कल किसी और टॉपिक का पोस्ट-मार्टम किया जायेगा......जाइए लाश का इंतज़ाम कीजिये....
Saturday, October 20, 2012
this is the beauty of medical science
Memory is the only best trick to understand it.
Mnemonics are like chemical formulas of millions of molecule.have to mug up all.
Most beautiful nurses u keep to entertain ur patients as cheer girls rather than for urself.
Every next year new edition of book comes and suddenly whole of ur knowledge till gained sum up into a big zero. restart the new one from the very first page whole of the year till new edition comes again to screw u.
Your patient will die if u apply ur concept instead of fixed protocol. bcoz there is a huge screwier named as "idiosyncrasy'.
Sunday, September 2, 2012
आपबीती - डॉ बबुआ से डॉ बाबा तक का सफ़र
आपबीती - डॉ बबुआ से डॉ बाबा तक का सफ़र
समय बीता. अब हम बड़े कारनामे करने लगे थे. किसी दोस्त के जन्मदिन पर मरीन ड्राइव में चिल्लाना और मिनी-ऑडिटोरियम के पीछे भसान डांस करना फिर मधुवन में खाना और दोस्त की थाली से चौमिन चुराना और एक ही ऑटो में लड़ाकर २५-३० लडको का आना."आज भी उन खानों की महक बाकी है इन साँसों में".
"हूटिंग करने का मजा और बड़े बड़े ग्रंथों में डूबने की सजा." मूड फ्रेश करने के लिए हमने कई सुहानी शामे लालपुर में गुजारी.
उस हादसे के साथ हम भी सीनियर बन गए.
venue-marine drive.
time-9.00am.
guest- 2k7 girls + boys
cross-ragging or introduction का अद्भुत दृश्य और शायद आखिरी भी.
क्लाइमेक्स तो तब आया जब ऍन वक़्त पर कॉलेज के महामहिम का काफिला आ धमका. फिर तो हमलोग ऐसे भागे जैसे किसी ने मधुमक्खी के छत्ते पर पत्थर मार दिया हो.
सेकंड इयर. वार्ड ड्यूटी शुरू. पहली बार डॉक्टर टाइप से फील हुआ.और साथ में शुरू हो गया सेकंड इयर सिंड्रोम. दो दिन खांसे तो लगा की टी.बी. हो गया है,चेस्ट पेन हुआ तो हार्ट अटैक की पढ़ाई शुरू.फिर तो रिम्स से अपोलो हॉस्पिटल तक का e.c.g.से echocardiography तक सबकुछ करा लिए. जब मेरे एक सीनियर को पता चला तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा-
" बेटा .Angina pectoris is an endemic infectious diseas of medical colleges caused by Angellina jollie."
सेकंड इयर का लाइफ भी e.c.g. के ग्राफ की तरह उबड़ खाबड़ रास्तों से होकर गुजरा. जैसे तैसे एग्जाम देकर MBBS का half life पूरा किया.
बहुत ही खट्टी और थोड़ी मीठी यादों के साथ 3rd year का life गुजर रहा था.करीबन १२ महीने तक लगातार examinee batch होने का गौरव प्राप्त हुआ. क्लास तो नसीब न था. हॉस्टल में रहकर एग्जाम की तैयारी करनी थी. लग रहा था mbbs का correspondence course कर रहे हों और PLT में जाकर test series दे रहे हैं.इसी बीच बेरोजगारी के क्षणों में कुछ हादसे भी हुए. anti-social का अवार्ड मिला,काला-पानी की सजा मिली, socially outcast हुए, बरजत की उपाधि से नवाजे गए, और तब से लेकर आजतक probable suicidal candidates list में मेरा नाम टॉप पे विराजमान है. क्या शानदार प्रदर्शन है, मगर हैरत की बात ये है की मैं आज तक ज़िंदा हूँ. बात अलाग है की palpitation aur hypertension लेकर शर्मिंदा हूँ, और हाल से ही गांजा-दारु-ciggerate की गली का बासिन्दा हूँ.
अब कुछ घटनाएं संक्षेप में-
१.दो साल से अज्ञातवास और एकांतवास में गए बाबा का पुनर्जन्म
२. 7th day जैसे article का controversial writer बनने का श्रेय प्राप्त.
३. '7th day' is an article of its own kind showing the controversial attitude and the volatile personality of the writer and the editor too. and the lack of support from batchmates as per the expectations.---spriha 2020
४. और आया 3rd MB का एग्जाम. 2k6-2k7 साथ साथ. दम भर k.c. किये और करवाए.
और अब आखिरी पड़ाव .
सुना था डॉक्टर कब्र में भी पढ़ते हुए पाए जाते हैं.इसलिए harrison-davidson के साथ दफनाये जाते हैं.एक पाव का दिमाग और १० पसेरी का किताब. मैं जितना था बिंदास --बन बैठा उतना ही बड़ा सेंटी-दास. किसी किसी को तो तुलसीदास भी नज़र आता हूँ.
कॉलेज लाइफ शुरू हुआ था BBC खैनी बिक्रेता {सिनर्जी २००७} से और ख़त्म हो रहा है दारू सिगरेट से. synergy में वो नौटंकी करना, शिखंडी बन कर चीर हरण करवाना, १०८ चुड़ैल के साथ रात गुजारना,गब्बर सिंह को खैनी खिलाना और माधव की फिल्म में विलेन का रोले निभाना.....
एक अंतर्मुखी लड़के को synergy के स्टेज पर कुछ कहने और करने लायक बनाने के लिए मैं अपने सीनियर का ताउम्र शुक्रगुजार रहूँगा.
एक विशेष अनुभव---
पहली बार सैनिक की तरह लड़ने का मौका मिला था. बस्ती वालो से लड़ाई हुई थी.पूरा कैंपस एकजुट.बीमारियों से लड़ने वाले डॉक्टर खुद को बचाने के लिए लड़ रहे थे. जीवन तो एक युद्ध क्षेत्र है, ये तो महज एक युद्ध का आगाज़ था...
कैंपस की एक परंपरा दिल को छू लेने वाली है.
MB exam के पहले सीनियर और जूनियर का "all the best " समारोह.
जाते जाते यादों का पिटारा भर रहा हूँ.
कुछ गुदगुदाते लम्हे, कुछ हेन- तेन कुछ this-that..
मैंने इन सब से बस यही सिखा है-
"किसी भी रिश्ते को अगर निभाया न जा सके तो उसे उस मुकाम तक पहुंचा कर छोड़ देना चाहिए कि फुर्सत में याद करें तो खुद पर नाज़ कर सके."
और एक दरखास्त खास उनसे-
"अभी उलझा हूँ खुद की जिंदगी सुलझाने में
फुर्सत मिली तो तेरी जुल्फे सुल्झाऊंगा
सोचूंगा जरुर उन लम्हों को
कभी मोहब्बत की थी तुमसे
कभी शरारत की थी तुमसे"
